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Life Shayari | जिंदगी शायरी लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पंछी करे न काम कविता PADHE EK KHAS ANDAAJ ME

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पंछी करे न काम, अरे राजू, दादा जी कहा करते थे — "अजगर करे न चाकरी,  पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए,  सबके दाता राम!" और फिर खुद ताउजी की पेंशन से चलाते थे आराम! नीम के नीचे बैठ के कहते — "बेटा चिंता ना कर, सब भगवान के हाथ!" और तभी मम्मी पीछे से चिल्लाती — "भगवान नहीं, बिजली का बिल भरने का है आज!" पर वहीं रमेश काका का लड़का, जिसे लोग कहते थे “पढ़ाकू बेवकूफ़”, वो अब सूट-बूट में घूमता है, और हमारे जैसे 'ग्यानी' देख के कहता है — "Hi अंकल, how are you?!" अब दादा जी का अजगर तो अब भी चाकरी नहीं करता, लेकिन पेट के लिए रोज़ दो रोटी की लाइन में खड़ा रहता। और पंछी? अरे वो भी अब Swiggy में डिलीवरी करता! कहते हैं — खाना नहीं, Experience Deliver करते हैं! राजू, अब हालत ऐसी है कि — दास मलूका को WhatsApp पर forward तो करते हैं, पर खुद Job के लिए हर जगह फ़ॉर्म भरते हैं। राजू, ये नया ज़माना है समझ ले, आराम से कुछ नहीं मिलता, ये ग़ज़ब जमाना है। दादा की बातें आदर में रखें, पर अब काम के बिना खाने को नहीं चखें। इसलिए अब ‘अजगर’ भी अप्लाई कर रहा फॉर्म, पंछी सीख...

DIGITAL"मेट्रो की धड़कनें मोबाइल की स्क्रीन पर” कविता पढ़ें हिंदी में

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मेट्रो – एक मोबाइल से कम नहीं               __राकेश प्रजापति  मेट्रो एक मोबाइल से कम नहीं, हर स्टेशन पर नेटवर्क की घंटी बजी, Wi-Fi हो या GPS की लाइन, हर कोना है डिजिटल, सबकुछ है फाइन। दरवाज़ा अपने आप खुले, बिना कहे ‘डिंग’ बोले, सामने स्क्रीन पर सब लिखा आता है, कहाँ उतरना है, कौन सा स्टेशन आता है। कोई इंस्टा पे Reels बना रहा, कोई Netflix पे वेब चल रहा। कोई ब्लूटूथ से गाने सुनता, तो कोई WhatsApp पर status चुनता। सीट भी जैसे फोन की चार्जिंग, किसी को मिलती, किसी को है लाचारी। Standing mode में सब लोग सेट, जैसे Mobile में चालू हो कोई Applet। साथ बैठे फिर भी दूर सभी, जैसे नेटवर्क है, पर range नहीं। बातें कम, स्क्रीन ज़्यादा चमकती हैं, सवाल भी अब emoji में ढलकती हैं। मेट्रो में Time भी fast-forward है, जैसे मोबाइल में Swipe Left-Right है। ना धक्का, ना रिक्शे की fight है, बस एक app से टिकट बुक — What a delight है! कह दो साफ-साफ दुनिया से कहीं — आज की मेट्रो, मोबाइल से कम नहीं! 📱🚇 नोट अगर पसंद आए तो comment लिखें और दोस्तों को शेयर करें 

Appraisal आया है!" PADHE MAJEDAAR फनी कविता HINDI ME

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" Appraisal आया है!" (ऑफिस की सबसे दर्दनाक खुशखबरी...) साल भर जी-जान से मेहनत की, हर ईमेल, हर कॉल में जान झोंक दी। सोचा था – इस बार तो जलवा होगा, Appraisal में बोनस का हलवा होगा! 😎 बॉस बोले – "You’ve done a decent job..." और मन बोला – “बस अब तीर लगने वाला है बॉब!” 🫣 मीटिंग रूम में बुलाया गया चुपचाप, HR भी मुस्कुरा रही थी, जैसे कुछ है खास। बॉस बोले – "You are valuable, consistent and loyal..." और पेपर पे दिखा — “Increment: 4%, That’s Final.” 😭 दिल ने कहा – "इतना ही था क्या मेहनत का सिला?" बॉस बोले – “Market standard है, समझा करो भइया।” Coffee मशीन से निकला धुआं, और अंदर से निकला आह भरा हुआ! ☕💔 सोचा था EMI कम करूंगा इस बार, अब Maggie खाकर गुज़रेगा फिर से हर वार। LinkedIn खोला, resume अपडेट किया, दोस्त को बोला – “भैया, कोई Job भेज ना तगड़ा!” 😤 पर फिर बॉस ने कहा – “Promotion next year पक्का है!” और हम फिर से Excel खोलकर बैठ गए — “चलो, क्या पता है...” 😅 नोट:अगर पसंद आए तो comment लिखें और दोस्तों को शेयर करें 

भोले का कावड़ी नहीं बनेगा,तो सच मान, अनाड़ी बनेगा। कविता पढ़ें

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" भोले का कावड़ी नहीं बनेगा, तो सच मान, अनाड़ी बनेगा। ✍️ राकेश प्रजापति भोले का कावड़ी नहीं बनेगा, तो सच मान, अनाड़ी बनेगा। सावन में जल नहीं चढ़ाएगा, तो अगले जनम में फिर कबाड़ी बनेगा। भक्ति का भी नियम समझ ले तू, सिर्फ ढोल बजा कर कुछ ना होगा। पढ़ ले, बढ़ ले इस जीवन में, बाबा का आशीर्वाद तभी साथ होगा। तू पढ़, तू बढ़ – यही भोले की मर्जी है, ज्ञान ही असली पूजा, यही सबसे सच्ची अर्जी है। जो मंदिर के साथ किताब को पकड़ेगा, वो ही जीवन में ऊपर चढ़ेगा। कांवर भी उठा, कलम भी थाम, सच्ची मेहनत से बन जाएगा तेरा नाम। भोले का नाम ले, पर आलस ना कर, पढ़ाई से ही खुलेगा सफलता का दर। ना मिर्गी नाच, ना झूठी ताली, भोले की भक्ति है सच्चाई वाली। पढ़ाई में जो भी आगे रहेगा, बाबा का आशीर्वाद उसमें बहता रहेगा। तो उठ, जाग, कलम को पकड़, भोले के नाम पे अब सपने सँवर। भक्ति भी कर, मेहनत भी कर, तू ही चमकेगा, तेरा ही नंबर। नोट अगर पसंद आए तो comment लिखें और दोस्तों को शेयर करें 

आपके लिए पेश है बेहतरीन "लाल शहर" लाल । SHAHAR कविता हिंदी में पढ़ें

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लाल शहर राकेश प्रजापति  लाल था सूरज, पर अब धूप नहीं रही वैसी। कभी जो तपता था उम्मीदों से, अब जलाता है सपनों की चादरें। लाल हैं दीवारें इस शहर की, जहाँ खून नहीं, ख्वाहिशें सूखती हैं। हर ईंट में बसी है थकान, और हर मोड़ पर बिकती है पहचान। यहाँ रातें भी लाल हैं — न चाँद की सफ़ेदी, न तारों का संगीत। बस सिग्नल की लाली में रुकी साँसें, और ट्रैफिक के शोर में डूबी तन्हाई। लाल रंग जो इश्क़ का होता था, अब डर बनकर छाया है, कभी होली में हँसी थी जो, अब अख़बारों में ख़बर बन आया है। लाल लिपस्टिक नहीं, अब सिर्फ़ गुस्से की लाली है होंठों पर, हर चेहरा यहाँ — मुखौटा है, हर मुस्कान — मजबूरी। शहर लाल है, क्योंकि उम्मीदों को रगड़ कर थक चुकी हैं उंगलियाँ। और अब इस रंग से रोज़गार, रोटी और रिवायतें भी सराबोर हैं।

कान पकाने वाली"कविता कान के पास हॉर्न मत बजा भैया!" पढ़ें

" कान के पास हॉर्न मत बजा भैया!" (झुंझलाहट में डूबी हल्की-फुल्की कविता) सुबह-सुबह निकले हैं सुकून की तलाश में, पर सड़क पे सब निकले हैं रेस की क्लास में। एक ट्रैफिक लाइट, सौ गाड़ियाँ कतार में, और भैया पीछे से हॉर्न लिए तैयार में! कान के पास आकर जो बजाए बीन, ऐसा लगे अब पकड़ूँ गले की स्कीन! 😤 "थोड़ा धैर्य रखो", मैं आँखों से समझाऊँ, पर वो बोले – "साइड दो!" और फिर से बजाऊँ! भैया! हॉर्न से गाड़ी उड़ती नहीं है, और आपकी चीख से मेरी नींद नहीं खुलती है। अगर सुकून से जीना है शहर में ज़रा, तो हॉर्न को मारो छुट्टी... और दिमाग को दो सहारा। नोट:अगर पसंद आए तो comment लिखें और दोस्तों को शेयर करें 

PADHE MAA KI DUA मां की दुआ BETE KE LIYE BEST कविता HINDI ME

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मां की दुआ   । MAA KI DUA ✍️ राकेश प्रजापति 👉 जब राहें धुंधली पड़ीं, मंज़िल हुई धुंधलाय, ➡️ मां की दुआ संग हो, रस्ता खुद मिल जाय।  👉 किस्मत जब रूठी लगे, लकीरें दें जवाब, ➡️ मां की ममता ढाल बन, कर दे हर दुख ख़ाक।  👉 ताबीज़ असर न करे, न पत्थर दे चैन, ➡️ मां की दुआ छू ले तो, मिटे हर इक दर्दैन।  👉 ठंडी सी छाया लगे, मां का आँचल पास, ➡️ उसकी दुआ से मिलता है, जीवन को विश्वास। 🌹 👉 जब दिल टूटा, हिम्मत हारी, उम्मीदें सब खो जाएँ, ➡️ मां की दुआ परवाज़ बने, राहें खुद सज जाएँ। 🌙 👉 कांपती आवाज़ कहे, “ख़ुदा तुझे संभाले,” ➡️ उस आशीष में छुपे हुए, जन्नत के उजाले। ✨ 👉 मां की दुआ वो नूर है, जो अंधेरा हर ले, ➡️ सफ़र कठिन हो चाहे, कदम हौले चल दे। 🌺 👉 दुनिया का हर ग़म झेले, और हर बोझ उठाए, ➡️ मां की दुआ बस दिल को, सुकून-सा दिलाए। 🌼 👉 ठंडी छाँव है मां की, गरमी में भी ठहराव, ➡️ उसकी दुआ से मिलता है, जीवन में विश्वास। 🌿 👉 मां की दुआ समंदर है, जिसमें प्रेम समाया, ➡️ चाहे दुख का तूफ़ान हो, उसमें भी चैन आया। 🌊 👉 मां का नाम जुबां पे हो, हर मुश्किल आसान, ➡️...

पढ़ें शानदार और जमीन से जुड़ी कविता "मुंबई का मोची "हिंदी में

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मुंबई का मोची चप्पलों की मरम्मत करते हुए, वो हर जोड़ी में पढ़ लेता है ज़िंदगी। सिली हुई पट्टियों के पीछे, कितनी टूटी उम्मीदें सिल चुका है वो। फुटपाथ पर बैठा, न शाम का शिकवा, न सुबह की शिकायत। मुंबई के शोर में दबा उसका नाम, पर काम ऐसा कि हर कोई पूछे — "भाई, जूता बन जाएगा?" धूप हो या बारिश की बाढ़, एक नीली तिरपाल ही उसका ऑफिस है। जहाँ न एसी है, न कुर्सी, पर हर ग्राहक को देता है फ़िनिशिंग टच। उसके पास कोई मोबाइल ऐप नहीं, न QR कोड, न इंस्टा पेज। फिर भी हर मोहल्ला जानता है उसे — मुंबई का मोची। कभी एक सेल्समैन की सोल सिली, कभी किसी दुल्हे की शादी की चप्पल। उसकी उंगलियाँ कहानी कहती हैं — घिसे हुए चमड़े से बने कुछ सपनों की। एक जोड़ी जूते की मरम्मत के पीछे, छुपा है उसका किराया, एक टाइम की चाय, और शायद स्कूल की फीस भी। कभी-कभी वह खुद भी सोचता है — "मेरे अपने जूते तो पुराने हैं, पर मैं रोज़ औरों को नये रास्ते देता हूँ।" मुंबई का मोची न कोई सेल्फी लेता है उसके साथ, न कोई पोस्ट करता है — #LocalHero पर वो है — इस शहर का असली कारीगर। नोट:अगर पसंद आए तो comment लिखें और दोस्तों को ...

AAJ KE DIN ME PADHE APNE GHAR KI मां का चूल्हा" KAVITA HINDI ME

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📝 "मां का चूल्हा  MAA KA CHULHA"  मां के चूल्हे में सदा, जलता ममता-प्यार। रोटी में घी कम सही, टपके स्नेह अपार॥ धुएँ से भीगी आँख जब, मां मुस्काए पास। जलते पल भी ठंड पड़ें, मिटे हृदय का त्रास॥ सुबह-सवेरे आग में, तपती हर दोपहर। बेटा भूखा ना रहे, मां का वचन अमर॥ अब तो गैस चढ़ा दिया, बदली रसोई रूप। सोंधी खुशबू खो गई, छौंक रहा बस धूप॥ चल रे राजू लौट चल, गांव पुराना आज। टूटा चूल्हा मां का वो, अब भी करे इन्तजार॥  बुझाती आग से, मां करती उपकार। पसीने की बूंदों में, दिखता सारा प्यार॥ लकड़ी काटे बापजी, मां जलाए आग। मिल-जुलकर चलता घर, जैसे रीत सुहाग॥ ओस भरी वो रातें थीं, अंगीठी की गर्मी। मां के शब्दों से मिले, जीवन को कोमलर्मी॥ गांव की चौखट गवाह है, मां की तपसी देह। रोटियों में ढल गया, त्याग और संदेह॥ स्मृतियों में बस गया, धुएँ का वह रंग। मां की बातें याद कर, भर आते हैं अंग॥ अब मशीनें रसोई में, पर न मिले वह स्वाद। मां के चूल्हे जैसी तो, कोई नहीं प्रसाद॥ मां का चूल्हा आज भी, देता यही पुकार। “बेटा लौटो गांव को, मैं हूं तुम्हें सँवार।” नोट:अगर पसंद आए तो comment लिखें और दोस्त...