कान पकाने वाली"कविता कान के पास हॉर्न मत बजा भैया!" पढ़ें
"कान के पास हॉर्न मत बजा भैया!"
(झुंझलाहट में डूबी हल्की-फुल्की कविता)
सुबह-सुबह निकले हैं सुकून की तलाश में,
पर सड़क पे सब निकले हैं रेस की क्लास में।
एक ट्रैफिक लाइट, सौ गाड़ियाँ कतार में,
और भैया पीछे से हॉर्न लिए तैयार में!
कान के पास आकर जो बजाए बीन,
ऐसा लगे अब पकड़ूँ गले की स्कीन! 😤
"थोड़ा धैर्य रखो", मैं आँखों से समझाऊँ,
पर वो बोले – "साइड दो!" और फिर से बजाऊँ!
भैया! हॉर्न से गाड़ी उड़ती नहीं है,
और आपकी चीख से मेरी नींद नहीं खुलती है।
अगर सुकून से जीना है शहर में ज़रा,
तो हॉर्न को मारो छुट्टी... और दिमाग को दो सहारा।
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