पंछी करे न काम कविता PADHE EK KHAS ANDAAJ ME
पंछी करे न काम,
अरे राजू, दादा जी कहा करते थे —
"अजगर करे न चाकरी,
पंछी करे न काम,
दास मलूका कह गए,
सबके दाता राम!"
और फिर खुद ताउजी की पेंशन से चलाते थे आराम!
नीम के नीचे बैठ के कहते —
"बेटा चिंता ना कर, सब भगवान के हाथ!"
और तभी मम्मी पीछे से चिल्लाती —
"भगवान नहीं, बिजली का बिल भरने का है आज!"
पर वहीं रमेश काका का लड़का,
जिसे लोग कहते थे “पढ़ाकू बेवकूफ़”,
वो अब सूट-बूट में घूमता है,
और हमारे जैसे 'ग्यानी' देख के कहता है —
"Hi अंकल, how are you?!"
अब दादा जी का अजगर तो अब भी चाकरी नहीं करता,
लेकिन पेट के लिए रोज़ दो रोटी की लाइन में खड़ा रहता।
और पंछी? अरे वो भी अब Swiggy में डिलीवरी करता!
कहते हैं — खाना नहीं, Experience Deliver करते हैं!
राजू, अब हालत ऐसी है कि —
दास मलूका को WhatsApp पर forward तो करते हैं,
पर खुद Job के लिए हर जगह फ़ॉर्म भरते हैं।
राजू, ये नया ज़माना है समझ ले,
आराम से कुछ नहीं मिलता, ये ग़ज़ब जमाना है।
दादा की बातें आदर में रखें,
पर अब काम के बिना खाने को नहीं चखें।
इसलिए अब ‘अजगर’ भी अप्लाई कर रहा फॉर्म,
पंछी सीख रहा MBA का फॉर्म,
राम जी सबके दाता हैं, इसमें शक नहीं,
पर मेहनत करे जो, उसकी किस्मत भी थकी नहीं।
तो सीख यही है, मेरे भोले राजू,
आराम से जीने की जो कहानी है पुरानी,
अब बस Facebook की पोस्टों में सुहानी।
असली बात तो यही है भाई —
"काम करेगा वही, नाम करेगा वही!"
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आपका अपना
_राकेश प्रजापति
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