AAJ KE DIN ME PADHE APNE GHAR KI मां का चूल्हा" KAVITA HINDI ME
📝 "मां का चूल्हा MAA KA CHULHA"
मां के चूल्हे में सदा, जलता ममता-प्यार। रोटी में घी कम सही, टपके स्नेह अपार॥
धुएँ से भीगी आँख जब, मां मुस्काए पास। जलते पल भी ठंड पड़ें, मिटे हृदय का त्रास॥
सुबह-सवेरे आग में, तपती हर दोपहर। बेटा भूखा ना रहे, मां का वचन अमर॥
अब तो गैस चढ़ा दिया, बदली रसोई रूप। सोंधी खुशबू खो गई, छौंक रहा बस धूप॥
चल रे राजू लौट चल, गांव पुराना आज। टूटा चूल्हा मां का वो, अब भी करे इन्तजार॥
बुझाती आग से, मां करती उपकार। पसीने की बूंदों में, दिखता सारा प्यार॥
लकड़ी काटे बापजी, मां जलाए आग। मिल-जुलकर चलता घर, जैसे रीत सुहाग॥
ओस भरी वो रातें थीं, अंगीठी की गर्मी। मां के शब्दों से मिले, जीवन को कोमलर्मी॥
गांव की चौखट गवाह है, मां की तपसी देह। रोटियों में ढल गया, त्याग और संदेह॥
स्मृतियों में बस गया, धुएँ का वह रंग। मां की बातें याद कर, भर आते हैं अंग॥
अब मशीनें रसोई में, पर न मिले वह स्वाद। मां के चूल्हे जैसी तो, कोई नहीं प्रसाद॥
मां का चूल्हा आज भी, देता यही पुकार। “बेटा लौटो गांव को, मैं हूं तुम्हें सँवार।”
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें