आपके लिए पेश है बेहतरीन "लाल शहर" लाल । SHAHAR कविता हिंदी में पढ़ें
लाल शहर
राकेश प्रजापति
लाल था सूरज,
पर अब धूप नहीं रही वैसी।
कभी जो तपता था उम्मीदों से,
अब जलाता है सपनों की चादरें।
लाल हैं दीवारें इस शहर की,
जहाँ खून नहीं, ख्वाहिशें सूखती हैं।
हर ईंट में बसी है थकान,
और हर मोड़ पर बिकती है पहचान।
यहाँ रातें भी लाल हैं —
न चाँद की सफ़ेदी, न तारों का संगीत।
बस सिग्नल की लाली में रुकी साँसें,
और ट्रैफिक के शोर में डूबी तन्हाई।
लाल रंग जो इश्क़ का होता था,
अब डर बनकर छाया है,
कभी होली में हँसी थी जो,
अब अख़बारों में ख़बर बन आया है।
लाल लिपस्टिक नहीं,
अब सिर्फ़ गुस्से की लाली है होंठों पर,
हर चेहरा यहाँ — मुखौटा है,
हर मुस्कान — मजबूरी।
शहर लाल है,
क्योंकि उम्मीदों को रगड़ कर
थक चुकी हैं उंगलियाँ।
और अब इस रंग से
रोज़गार, रोटी और रिवायतें भी सराबोर हैं।

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