SOCH ME DALNE WALI लाल नदी कविता -LAL NADI WALI BEST KAVITA
EK ESI KAVITA JO DIL KO SOCHNE PAR MAJBOOR KARE
लाल नदी
बहती है एक नदी —
नीली नहीं, पारदर्शी नहीं,
ये नदी लाल है।
न रक्त की बात है पूरी,
न सिर्फ़ मिट्टी की,
ये लाल है
क्योंकि इसमें डूबे हैं
हज़ारों संघर्षों के प्रतिबिंब।
किसी ने हल चलाया था खेत में,
तो पसीना मिला इस पानी में।
कहीं गोली चली थी सीमा पर,
तो ख़ून की बूँद भी बह चली साथ में।
लाल नदी —
जो बहती है हर उस जगह से,
जहाँ अन्याय ने पांव पसारे,
और प्रतिरोध ने उत्तर दिया।
इस नदी के किनारे
कोई मूर्तियाँ नहीं,
सिर्फ़ निशान हैं —
हथौड़े के, फावड़े के,
और जलती आँखों के।
ये लाल नदी —
न ही कोई पूजा मांगती है,
न कोई पुल।
बस पूछती है एक सवाल:
“कब तक बहूँगी मैं… यूँ ही चुपचाप?”
हर बार जब कोई बच्चा
भूख से रोता है,
हर बार जब कोई मज़दूर
बिना मज़दूरी के लौटता है,
ये नदी एक लहर और उछालती है।
शहरों के नीचे से गुज़रती हुई,
गाँवों के खेतों को भिगोती हुई,
कभी बाँधों से रोकी जाती है,
तो कभी नारे बनकर फूटती है।
लाल नदी —
एक चेतावनी है,
एक आवाज़ है,
एक बहाव है जो कहता है:
"मैं रुकूंगी नहीं,
जब तक इंसाफ़ की ज़मीन हरी नहीं हो जाती।”
नोट:अगर पसंद आए तो comment लिखें और दोस्तों को शेयर करें
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें