बीते हुए वक्त याद वापिस से दिला देने वाली कविता पढ़ें "चाचा की घड़ी "
BITE HUYE KAL KI YAD CHACHA JI KI GHADI
"चाचा की घड़ी"
(कविता)
अरे राजू,
अपने चाचा की घड़ी किधर गई?
वो जो कमीज़ की जेब में नहीं,
दिल के क़रीब टंगी रहती थी।
सुनहरी बॉर्डर,
थोड़ी खरोंच वाली डायल,
और टिक-टिक की वो आवाज़
जिसमें चाचा का ठहराव होता था —
ना जल्दी, ना देर,
बस जैसे वक़्त को जीते थे।
हर रविवार सुबह
वो उसे रूमाल से साफ़ करते,
और कहते —
"घड़ी वक़्त बताती है,
पर सही वक़्त बनाते हम हैं बेटा!"
वो घड़ी कभी खेत में गई,
कभी शादी में चमकी,
कभी रेलवे स्टेशन की टिकट लाइन में
सही समय बताकर सबको मुस्कराया।
अब तो वक़्त मोबाइल में है,
और चाचा फ़ोटो में,
पर उनकी वो टिक-टिक
कभी-कभी आज भी
सीने में गूंज जाती है।
अरे राजू,
चल ढूंढें वो घड़ी —
शायद आज भी टिक-टिक करती हो,
पर हमें सुनाने वाला कोई नहीं रहा।
नोट:अगर पसंद आए तो comment लिखें और दोस्तों को शेयर करें
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें