वक्त निकालकर पढ़ें राजू की बचपन की साइकिल हिंदी में । Bachpan ki best kavita
"राजू की साइकिल"
Bachpan ki best kavita
राकेश प्रजापति
अरे राजू,
अपनी पुरानी वाली साइकिल किधर गई?
वो जो आधी तेरी थी,
आधी मेरी —
जिसे बिना घंटी के भी
पूरा मोहल्ला पहचानता था।
वो टेढ़े हैंडल,
वो घिसा हुआ ब्रेक,
और पैडल मारते ही
उड़ने का एहसास —
जैसे पंख न हो,
पर हम हवा से बातें करते हों।
तू चलाता,
मैं पीछे कैरियर पर चिपका रहता —
और जब ढलान आती,
तो हम दोनो “हाथ छोड़” स्टंट करते,
जैसे खुद को सुपरहीरो समझते थे।
कभी स्कूल, कभी नदी,
कभी बस यूँ ही गाँव की गलियों में
वो साइकिल ही तो थी
हमारे सपनों की पहली सवारी।
अब तो तू कार में चलता है,
मैं मोबाइल में गुम हूं,
पर दिल के किसी कोने में
वो चिलचिलाती धूप में
घंटों पैडल मारना
अब भी बरसात बनकर टपकता है।
अरे राजू,
चल फिर ढूंढें वो साइकिल —
जंग लगी हो तो क्या,
यादों की हवा में
वो आज भी दौड़ सकती है।
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