इंक दवात वाली शीशी_कविता -BACHPAN KI INK WALI DAWAAT-PADHE SHANDAR । Bachpan ki best kavita
"PADHE BEST COLLECTION BACHPAN KI INKDAWAAT"
कविता: इंक दवात वाली शीशी Bachpan ki best kavita
अरे राजू,
अपना वो इंक दवात वाला शीशी किधर गया?
वो जो दादी के संदूक से निकलती थी —
नीली, गाढ़ी, और हाथों को रंग देती थी।
याद है तुझे,
कैसे लकड़ी की कलम को चूस-चूस के चलाते थे?
स्याही ज़्यादा भर जाए तो कापी पर फैल जाती थी,
और मास्टरजी आँखें तरेर कर देख जाते थे।
उस शीशी में सिर्फ स्याही नहीं थी,
बचपन के अक्षर थे —
"क से कबूतर", "ग से गणेश",
और माँ की गोदी में रटते हुए पहाड़े।
अरे राजू, आजकल तो सब टचस्क्रीन हो गया,
ना वो कागज़, ना दवात, ना स्याही की लड़ाई।
अब कोई उंगली नीली नहीं होती,
ना ही कोई ‘कलम तोड़’ शेराई।
अगर मिल जाए कहीं वो दवात,
तो उसमें फिर से अपने नाम की पहली ‘र’ लिखूँगा।
और सोचूँगा —
कैसे स्याही में भी हमारी जड़ों की सच्चाई छुपी होती थी।
अरे राजू,
अगर मिल जाए वो शीशी —
तो संभाल के रखना,
वो सिर्फ इंक नहीं… हमारी पहचान थी।
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