ऐसी बेहतरीन KAVITA । कविता की लाइनें की दिल खुश हो जाए "दादा जी का तोते वाला पिंजरा _कविता
कविता: दादा जी का तोते वाला पिंजरा
_राकेश प्रजापति
अरे राजू,
अपना दादा जी वाला तोते का पिंजरा किधर गया?
वो जो छत की मुंडेर पर टंगा रहता था,
और हर सुबह “राम-राम” बोलकर दिन शुरू करता था।
याद है, दादा जी कैसे
मिर्ची और चावल मिलाकर तोते को खिलाते थे?
और वो हरे पंखों वाला शरारती तोता
हर आने-जाने वाले को देख के “सीटी” मारता था।
हमने भी तो उसके पीछे सीटी बजाना सीखा था,
और हर बार वो मुंह फुलाकर हमें देखकर मुड़ जाता था।
जब स्कूल से लौटते थे,
तो सबसे पहले उसे “नमस्ते” करते थे।
दादा जी कहते थे —
"ये पिंजरा खुलता नहीं,
पर इसकी आवाज़ बहुत दूर जाती है..."
शायद उस तोते में दादा की तन्हाई भी थी,
और हमारी बालसुलभ बातें भी।
अब ना दादा रहे,
ना वो पिंजरा, ना ही वो हरा दोस्त।
घर की छत तो अब भी है —
पर वहां सिर्फ सन्नाटा बैठा है, पंख फैलाकर।
अगर कहीं मिल जाए वो पिंजरा,
तो उसमें फिर से कोई परिंदा ना सही,
पर दादा जी की आवाज़ ही बंद कर लाऊंगा —
"राम राम बिटवा... स्कूल से आ गए?"
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