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माँ का ताबीज" । MAA KA TABEEZ कविता PADHE DIL KO CHHOO LENE WALI

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MAA KA TABEEZ KAVITA PADHE माँ का ताबीज" ✍️ राकेश प्रजापति जब कभी मुसीबत में रहना, तो माँ को याद कर लेना, उसके आँचल से बाँधा हुआ वो छोटा सा ताबीज टटोल लेना। वो कोई धागा नहीं, वो माँ की रातों की जागी दुआ है, जो हर बला को दरवाज़े से पहले रोक लेती है। जिस दिन तू टूटा-सा लगे, खुद से भी रूठा-सा लगे, तो उस ताबीज़ को पकड़कर बस एक बार माँ को याद कर लेना। न जाने कितनी बार तेरी खामोशियों पर उसने मंत्र पढ़े हैं उस धागे पर, कि तेरी साँसों को कोई भी तकलीफ छू न पाए। वो ताबीज़ अब भी कहता है – "बेटा, गिर मत जाना, मैं हूँ न, तेरी माँ की तरह तेरे साथ हर दहलीज़ पर।" नोट:अगर पसंद आए तो comment लिखें और दोस्तों को शेयर करें 

ऐसी बेहतरीन KAVITA । कविता की लाइनें की दिल खुश हो जाए "दादा जी का तोते वाला पिंजरा _कविता

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कविता: दादा जी का तोते वाला पिंजरा             _राकेश प्रजापति  अरे राजू, अपना दादा जी वाला तोते का पिंजरा किधर गया? वो जो छत की मुंडेर पर टंगा रहता था, और हर सुबह “राम-राम” बोलकर दिन शुरू करता था। याद है, दादा जी कैसे मिर्ची और चावल मिलाकर तोते को खिलाते थे? और वो हरे पंखों वाला शरारती तोता हर आने-जाने वाले को देख के “सीटी” मारता था। हमने भी तो उसके पीछे सीटी बजाना सीखा था, और हर बार वो मुंह फुलाकर हमें देखकर मुड़ जाता था। जब स्कूल से लौटते थे, तो सबसे पहले उसे “नमस्ते” करते थे। दादा जी कहते थे — "ये पिंजरा खुलता नहीं, पर इसकी आवाज़ बहुत दूर जाती है..." शायद उस तोते में दादा की तन्हाई भी थी, और हमारी बालसुलभ बातें भी। अब ना दादा रहे, ना वो पिंजरा, ना ही वो हरा दोस्त। घर की छत तो अब भी है — पर वहां सिर्फ सन्नाटा बैठा है, पंख फैलाकर। अगर कहीं मिल जाए वो पिंजरा, तो उसमें फिर से कोई परिंदा ना सही, पर दादा जी की आवाज़ ही बंद कर लाऊंगा — "राम राम बिटवा... स्कूल से आ गए?" नोट:अगर पसंद आए तो comment लिखें और दोस्तों को शेयर करें 

दादा जी का पीतल का लोटा किधर गया? पढ़ें BEST कविता हिंदी में

दादा जी का पीतल का लोटा किधर गया? अरे राजू, अपने दादा जी का पीतल का लोटा किधर गया? जो हर सुबह मंदिर के घाट पर चमकता था, जिसमें सूरज की पहली किरण झलकती थी। जिससे वो तुलसी को पानी देते थे, और कहते थे — "बेटा, पूजा पहले, फिर बाकी सब!" जिसकी टप-टप बूँदों की आवाज़ से घर के आँगन में भोर उतरती थी। जिसे तू नहलाते वक्त नाव समझ नहर में बहाता था, और दादा जी हँसते हुए कहते — "बड़ा आया समुंदर वाला!" जिस पर नाम खुदा था — "रामप्रसाद", उनके हाथों की छाप अब भी ज़िंदा थी उसमें। अरे राजू, याद है तुझे वो लोटा लेकर दादा जी खेत की मेड़ों पर जाते थे, और रास्ते में हर किसान को राम-राम कहते थे, जैसे वो लोटा कोई साधु की कमंडल हो। अब ना वो दादा हैं, ना वो खेत बचे हैं, और शायद वो लोटा भी कहीं खो गया है या किसी कबाड़ वाले के हाथ बिक गया है। अब ना वो लोटा दिखता है, ना दादा जी की वो सुबहें। बस छत पर पड़ी खाली बाल्टी है, और तेरी अलार्म वाली नींदें। अरे राजू, अपने दादा जी का पीतल का लोटा किधर गया? नोट:अगर पसंद आए तो comment लिखें और दोस्तों को शेयर करें