दादा जी का पीतल का लोटा किधर गया? पढ़ें BEST कविता हिंदी में
दादा जी का पीतल का लोटा किधर गया?
अरे राजू,
अपने दादा जी का पीतल का लोटा किधर गया?
जो हर सुबह मंदिर के घाट पर चमकता था,
जिसमें सूरज की पहली किरण झलकती थी।
जिससे वो तुलसी को पानी देते थे,
और कहते थे — "बेटा, पूजा पहले, फिर बाकी सब!"
जिसकी टप-टप बूँदों की आवाज़ से
घर के आँगन में भोर उतरती थी।
जिसे तू नहलाते वक्त नाव समझ नहर में बहाता था,
और दादा जी हँसते हुए कहते — "बड़ा आया समुंदर वाला!"
जिस पर नाम खुदा था — "रामप्रसाद",
उनके हाथों की छाप अब भी ज़िंदा थी उसमें।
अरे राजू, याद है तुझे वो लोटा लेकर
दादा जी खेत की मेड़ों पर जाते थे,
और रास्ते में हर किसान को राम-राम कहते थे,
जैसे वो लोटा कोई साधु की कमंडल हो।
अब ना वो दादा हैं, ना वो खेत बचे हैं,
और शायद वो लोटा भी कहीं खो गया है
या किसी कबाड़ वाले के हाथ बिक गया है।
अब ना वो लोटा दिखता है,
ना दादा जी की वो सुबहें।
बस छत पर पड़ी खाली बाल्टी है,
और तेरी अलार्म वाली नींदें।
अरे राजू,
अपने दादा जी का पीतल का लोटा किधर गया?
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