दादा जी का हुक्का_कविता । Bachpan ki best kavita PADHE BAHOT HI MAJEDAAR HINDI ME
हुक्के की गुड़गुड़ और दादा जी की गूंज WALI KAVITA PADHE
🐚 कविता: दादा जी का हुक्का
अरे राजू,
अपने दादा जी का हुक्का किधर गया?
वो जो आंगन के कोने में
चुपचाप बैठा भी…
घर का सबसे ज़्यादा बोलने वाला होता था।
जिसकी हर गुड़गुड़ाहट में
एक किस्सा छुपा होता,
कभी आज़ादी की बात,
तो कभी बरसात के खेतों की याद।
दादा जी की आवाज़
हुक्के के धुएँ से भी भारी होती थी,
और जब वो "हूं…" करते थे,
तो लगता था जैसे पूरा गांव सहम जाता हो।
अब ना वो चौकी है,
ना वो सोंधी तम्बाकू की खुशबू,
ना वो दोपहर में बैठकर
हाथ की थपकी के साथ सुनाई गई कहानियाँ।
अरे राजू,
हुक्का कोई तम्बाकू का बर्तन नहीं था,
वो तो हमारी जड़ों की जड़ था —
जहां से रिश्ते, परंपरा, और अपनापन
धुआँ बनकर फैलते थे।
अब अगर वो हुक्का मिल जाए,
तो मैं उसमें कोई तम्बाकू नहीं भरूंगा,
बल्कि भरूंगा —
दादा जी की यादों की राख, और एक आख़िरी किस्सा।
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