अरे राजू, सरोता किधर गया? कविता -SUPARI KATNE KA SARAUTA WALI । Bachpan ki best kavita
अरे राजू, सरोता किधर गया?
Bachpan ki best kavita ✍️
अरे राजू,
अपना दादा जी का सुपारी कुतरने वाला सरोता किधर गया?
कहीं नजर नहीं आ रहा है,
वो जो चूल्हे के पास रखा रहता था,
हर सुबह जैसे किसी पूजा की तरह इस्तेमाल होता था।
याद है न?
दादा जी आराम से पीढ़े पर बैठते थे,
धोती को घुटनों तक मोड़कर,
कंधे पर गमछा डाले,
और सरोता पकड़ते थे,
जैसे कोई राजा अपने राजदंड को उठाता हो।
धीरे-धीरे सुपारी कतरते थे,
एक लय में — टुक... टुक... टुक...,
और हम, आसपास मंडराते थे,
जैसे मधुमक्खियाँ शहद के छत्ते के पास।
जब हम जिद करते थे,
तो मुस्कुराते हुए थोड़ा-थोड़ा हमें भी देते थे।
पहले सुपारी के टुकड़े,
फिर चुटकी भर कत्था,
थोड़ी देर बाद थोड़ा सा पान,
और आखिर में, तिलक की तरह
एक लौंग हमारी हथेली में रखते थे।
वो स्वाद आज भी जीभ पर बैठा है —
बिना मिठास के भी कितना मीठा लगता था!
और वो प्यार?
वो तो दुनिया की सबसे अमीर दावत थी।
अब ना सरोता है,
ना दादा की वो अदाएं।
न वो पीढ़ा, न वो गमछा,
न ही वो कहानियों वाली शामें।
अरे राजू,
अगर कभी वो सरोता मिल जाए न,
तो उसे संभाल कर रखना —
वो सिर्फ एक औजार नहीं था,
वो हमारे बचपन का सबसे मीठा खिलौना था।
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