दादा जी के आंगन का घड़ा किधर गया?" । Bachpan ki best kavita, कविता पढ़ें हिंदी में
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"दादा जी का घड़ा किधर गया?"
Bachpan ki best kavita
(कवि: राकेश प्रजापति)
अरे राजू,
दादा जी का वो पानीबप्पी मिट्टी का घड़ा किधर गया?
जो बरामदे की छांव में रखा रहता था,
न धूप से डरता, न साये से भागता था।
घड़े की गर्दन पर नीले रंग की रेखा होती थी,
ढक्कन की जगह वो उलटी रखी कटोरी होती थी।
हर दोपहर, उसी से पीते थे पानी,
जिसमें सौंधी मिट्टी और प्यार की कहानी।
दादी कहतीं —
"इसमें तुलसी डाल दो, ठंडा रहेगा,"
कभी नींबू, कभी गुलाब,
घड़ा बनता रहता था देसी शरबत का जवाब।
राजू, याद है?
हम घड़े के नीचे हाथ लगा के देखते थे,
कितना भी भरा हो —
वो कभी छलकता नहीं था,
जैसे किसी साधु की तरह संयमित था।
अब कहाँ है वो घड़ा?
अब तो फ्रिज की बोतलें हैं,
जिनमें न सौंध है, न सुकून,
बस ठंडक है — मगर बेज़ायका।
राजू,
दादा जी का घड़ा
सिर्फ मिट्टी का बर्तन नहीं था,
वो हमारी जड़ों से जुड़ी एक कहानी था।
अब उस घड़े की जगह
स्मार्ट वाटर प्यूरीफायर हैं,
पर न उनमें वो स्वाद है,
न दादा जी की मुस्कान।
अरे राजू...
बता ना यार...
वो घड़ा...
किधर गया?
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