बचपन याद करा देने वाली कविता "दादी की सुई-धागे की डिब्बी" पढ़ें । Bachpan ki best kavita हिंदी में
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"दादी की सुई-धागे की डिब्बी"
Bachpan ki best kavita
अरे राजू,
अपने दादी का सुई-धागे की डिब्बी किधर गई?
वो जो बिस्तर के सिरहाने
एक छोटी सी पोटली में रहती थी —
चुपचाप, पर हर ज़रूरत में बोल पड़ती थी।
धागों के बीच उलझा था
घर का हर सदस्य —
कभी बटन जोड़ती,
तो कभी फटी जेबों में
खामोश दुआ टांक देती थी।
उस डिब्बी में
लाल, पीले, नीले धागे थे,
और एक पुराना चश्मा,
जिससे दादी बिना देखे
हर टूटे कपड़े को ठीक कर देती थी।
वो ऊँगली में बंधा धागा,
वो “सुई में धागा डाल दो बेटा” वाली आवाज़,
और फिर आंखों में
थोड़ा धुंध, थोड़ा अपनापन —
सब आज भी याद आता है राजू।
अब तो रेडीमेड ज़माना है,
कपड़े फटते नहीं —
क्योंकि लोग बदल जाते हैं उससे पहले।
पर दादी की वो डिब्बी,
जिसमें धागे से ज़्यादा ममता रखी होती थी,
शायद किसी पुराने संदूक में
अब भी हमें बुला रही है।
अरे राजू,
चल न...
दादी की वो डिब्बी ढूंढें —
शायद उसमें
अब भी एक धागा हमारे लिए रखा हो।
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