गांव का बहरा नाई WALI BEST कविता PADHE BAHUT HI INTRESTING Bachpan ki best kavita,
Childhood Memories Shayari | बचपन की यादें शायरी ME PADHE BAHRA NAHI GAV KA
"गांव का बहरा नाई" — राकेश प्रजापति की कलम से
Bachpan ki best kavita
अरे राजू, अपने गांव का बहरा नाई किधर है?
जो बिना सुने भी सबकी सुन लेता था,
और बिना कहे ही ज़िंदगी की उलझनें सुलझा देता था।
उसकी दुकान कोई साधारण जगह नहीं थी,
वो तो गांव का छोटा सा संसद भवन था,
जहां आधे बाल कटते, आधे फसाद।
माथे पर हल्की मुस्कान, हाथ में पुरानी कैंची,
और कानों में वो ऊंचा सुनने वाला सन्नाटा—
फिर भी सबकी आवाज़ उसके दिल तक पहुंचती थी।
कभी हुक्के के धुएं में बातों की घुट्टी मिलती थी,
कभी गांव की राजनीति उसी की दुकान में पलती थी,
हर आदमी वहां जाते-जाते 'नेता' बन जाता था,
और आते-आते बालों के साथ अपनी अकड़ भी छँटवा लाता था।
तू याद है राजू? वो कैसे आंखों से ही इशारा करता था,
"तू चुप बैठ, तेरी बीवी पिछली बार आई थी शिकायत लेकर!"
और फिर सब हँसते थे — बिना आवाज़, बिना कारण।
अब तो शहर के सलून में बस शीशे और सन्नाटा है,
ना बातों का शोर, ना किस्सों की गर्मी,
ना वो पुराना झल्लाया हुआ तौलिया,
ना वो पुरानी रेडियो पर बजता अल्हड़ सा गीत।
राजू, अगर मिले कहीं वो बहरा नाई,
तो कहना — गांव अब भी वैसा ही है,
पर उसके बिना कुछ खामोश-खामोश सा लगता है।
नोट:अगर पसंद आए तो comment लिखें और दोस्तों को शेयर करें
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें