चाचा का रेडियो | हिंदी कविता | बचपन और यादों पर । Bachpan ki best kavita
"चाचा का रेडियो" – राकेश प्रजापति की एक संवेदनशील हिंदी कविता। पुराने रेडियो की आवाज़ में छिपी आकाशवाणी, क्रिकेट की कमेंट्री और मुकेश के नग़मे – सब यादों की खुशबू समेटे।
चाचा का रेडियो Bachpan ki best kavita
अरे राजू,
अपने चाचा का रेडियो किधर गया रे?
वही पुराना, भुरभुरा-सा रेडियो
जिसकी आवाज़ आती थी —
"ये आकाशवाणी है, अब आप समाचार सुनिए..."
चाचा उसे सीने से लगाकर सुनते थे,
जैसे कोई पुराना दोस्त हो,
कभी क्रिकेट की कमेंट्री,
तो कभी मुकेश के दर्द भरे नग़मे...
याद है न,
जब बारिश में रेडियो खराब हो जाता था
तो चाचा झाड़ू की सींक से एंटीना ठोंकते थे —
जैसे जादू कर रहे हों!
अब ढूंढने जाओ तो न रेडियो है,
न वो 'गूंजती हुई दोपहरें',
घर में मोबाइल हैं,
पर वो "सुनने" वाला सुकून नहीं है राजू...
चल,
कभी पुराने बक्से में देखें,
या चाचा की शॉल में लिपटा मिल जाए कहीं —
वो रेडियो नहीं, बचपन की धुनें थीं। 📻🎶
अब आवाज़ नहीं आती,
पर यादों की तरंगें अब भी बजती हैं...
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