कभी न भूलने वाली बचपन की याद "अपना कुआं किधर गया रे? "कविता के रुप में । Bachpan ki best kavita
अपना कुआं किधर गया रे? Bachpan ki best kavita
अरे राजू,
अपना कुआं किधर गया रे?
वही — जो चांदनी रातों में तारों को निहारता था,
जहां मां बाल्टी से पानी खींचती थी
और हर डोल में ठंडक के साथ यादें भी निकलती थीं।
अब तो न दिखे वो पुरानी जगत,
न रस्सी की चर्र-चर्र की आवाज़,
न पनघट की वो मीठी बतकही,
न वो झांकते हुए डर — “कोई धक्का न दे दे!”
शायद सड़क बन गई है वहां,
या किसी ने सीमेंट से भर दिया होगा...
कहते हैं ‘विकास’ आया है गांव में —
पर बचपन की तहज़ीब भी तो चली गई साथ!
चल राजू,
आज फिर यादों की बाल्टी डालते हैं,
देखें कहीं से ठंडा मीठा पानी मिल जाए —
या बचपन का अक्स ही लौट आए।
💧🌙
वो कुआं तो चला गया राजू,
पर उसमें डूबी हमारी हँसी — अब भी वहीं गूंजती है।
पीपी
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