छोटे गांव का बचपन का मेला । Bachpan ki best kavita PADHE HINDI ME
गांव के बचपन का मेला Bachpan ki best kavita
— राकेश प्रजापति
मिस करता हूँ वो बचपन का मेला,
जहाँ हर चीज़ में था अपना ही रेला।
नहीं था मोबाइल, नहीं थी भीड़,
पर हर दिल में बसती थी उम्मीद की पीढ़।
मिट्टी की खुशबू, हवा में मिठास,
गुब्बारे वाला, और वो गोलगप्पे का स्वाद।
झूले की कतारें, चूड़ी की दुकानें,
माँ की पकड़ी ऊँगली, और आँखों में ठिकाने।
चाट की वो थालियाँ, मुरब्बे का ठेला,
लौंग वाली इमली, और लकड़ी का झूला।
बाँसुरी की धुन पर नाचता था मन,
जैसे हर पल में छुपा हो बचपन का धन।
कभी खो जाते थे खिलौनों की भीड़ में,
कभी भागते थे दोस्तों के पीछे पीपल की छांव में।
वो पिताजी का पाँच रुपये का नोट,
जिसमें पूरे मेले का ख़ुशियों का कोट।
अब सब है, पर वो मेला नहीं,
हैं मेले बड़े, पर वो दिलवाला खेला नहीं।
जो था सादगी में, वो अब दिखावा है,
गांव का बचपन बस अब इक सपना है।
काश लौट सकूं उस पगडंडी की राह,
जहाँ मेला था, और मैं था बेपरवाह।
अब सिर्फ यादें हैं, आँखों में झिलमिल,
वो मेला… जो आज भी है सबसे हसीन महफिल।
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