बचपन वाला तालाब । Bachpan ki best kavita कविता PADHE IS DUNDER TALAB KE UPAR
बचपन वाला तालाब Bachpan ki best kavita
अरे राजू, अपना बचपन वाला तालाब किधर गया
कहीं नजर नहीं आ रहा है,
ना वो पानी, ना वो किनारा,
ना वो कूदती मछलियाँ, ना वो हमारा गुज़ारा।
वो जो किनारे बैठकर
हम मिट्टी के घर बनाते थे,
कागज़ की नावें बहाते थे,
अब वहाँ तो इमारतें उग आई हैं,
और यादें धूल में दब गई हैं।
अरे राजू,
जिस तालाब में तेरी पहली तैराकी थी,
जहाँ तू फिसल के गिरा था और सब हँस पड़े थे,
अब वहाँ सन्नाटा है —
ना बच्चे हैं, ना उनकी हँसी।
तू बता,
क्या बचपन को भी कोई बेच सकता है राजू?
क्योंकि लगता है हमारा तालाब
किसी सौदे में चला गया है।
चल, कहीं बैठकर याद करते हैं वो दिन,
जब सिर्फ पानी नहीं,
हमारे सपने भी उस तालाब में तैरते थे।
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