भूरी गाय | हिंदी कविता | गांव और बचपन की यादों पर । Bachpan ki best kavita भूरी गाय का खूंटा"
"भूरी गाय" – राकेश प्रजापति की संवेदनशील हिंदी कविता। बचपन की वो गाय जो दूध के साथ सुकून भी देती थी, उसकी घंटी की आवाज़ और गांव की यादें इस कविता में जीवंत हो उठती हैं।
"भूरी गाय का खूंटा" Bachpan ki best kavita
(गांव की यादों से)
अरे राजू,
अपनी भूरी गाय किधर गई?
वो जो हर सुबह
दूध के साथ बचपन भी दे जाती थी।
उसका खूंटा भी अब नहीं दिखता,
जहाँ वो बंधी रहती थी बड़े इत्मीनान से,
और हम उसके गले की घंटी की
मद्धम सी आवाज़ में
सुकून खोजते थे।
वो बड़े कान हिलाना,
पूंछ से मक्खी उड़ाना,
दादी के हाथों से रोटी खाते हुए
आंखों से प्यार जताना —
सब कुछ किसी कोने में गुम सा हो गया।
अब वो आंगन सूना है,
न गोबर की सोंधी गंध है,
न सुबह-सुबह की रंभाहट,
जो नींद से प्यारे सपनों को हौले से जगाती थी।
राजू,
क्या हमारे साथ-साथ
गांव की आत्मा भी शहर चली आई?
चल कभी चलें वापस,
शायद वो खूंटा अब भी किसी दीवार से टिककर
हमें आवाज़ दे रहा हो।
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