चाचा का कोट किधर गया । कविता । Bachpan ki best kavita PADHE EK KHAS ANDAAJ ME
BACHPAN KI YADE ME PADHE KHAS SHAYRI CHAHA KA COAT
चाचा का कोट किधर गया? Bachpan ki best kavita
अरे राजू, अपने चाचा का कोट किधर गया?
जो हर शादी-ब्याह में निकलता था,
थोड़ा टेढ़ा, थोड़ा सीधा,
जेब में पुराने सिक्कों की खनक लिए।
अरे वही भूरे रंग का भारी कोट,
जिसके अंदर चाचा जी की खुशबू बसती थी —
बीड़ी, चंदन और सरसों के तेल की मिलावट वाली।
राजू, याद है?
जब वो कोट पहनकर चाचा जी बड़प्पन से चलते थे,
कभी बारात में, कभी तहसील में,
और हम पीछे-पीछे चलते, जैसे उनके अंगरक्षक।
उस कोट की बाईं जेब में एक पुरानी पेन थी,
जिससे चाचा जमीन के कागज साइन करते थे,
और दाईं जेब में माचिस,
कभी-कभी उसमें से गुड़ की डली भी निकल आती थी।
अब न वो कोट है,
न चाचा की वो शान,
बस शादी में branded blazer दिखते हैं —
पर उनमें कहां है वो "गांव वाली जान"?
अरे राजू,
अपने चाचा का वो इकलौता कोट,
जिसमें गरमी में भी गरिमा थी,
और ठंडी में भी ठाठ —
किधर गया यार?
किधर गया?
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