चाचा की पुरानी बुलेट किधर गईं? कविता - CHACHA KI BULLET WALI KAVITA
अरे राजू, अपने चाचा की पुरानी बुलेट किधर गईं?
जो गली में गूंजती थी, जैसे कोई सेना चली आई हो,
जिसके साइलेंसर से गांव की नींद टूट जाया करती थी।
जिसपे बैठ के चाचा छाती चौड़ी करके निकलते थे,
तेज़ हवा से झूलती उनकी सफेद शर्ट,
और आंखों पर काला चश्मा — बस फिल्मी हीरो ही लगते थे।
गांव के बच्चे उसके पीछे दौड़ा करते थे,
और चाची हर बार कहतीं – “धीरे चलाओ जी!”
पर चाचा हंसते, “बुलेट है भाभी, दिल की नहीं सुनती।”
तू बता राजू, वो पुरानी बुलेट अब कहां है?
क्या किसी खटारा गैरेज में खड़ी जंग खा रही है?
या शहर के किसी सौदे में बिक गई बेआवाज़ सी?
वो बुलेट नहीं थी बस एक बाइक,
वो चाचा की शान थी, उनकी जवानी की तान थी।
राजू, अगर मिल जाए कहीं —
तो बोल देना, चाचा की धड़कनों को वापस लाना है!
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