अरे राजू अपने बचपन की बैलगाड़ी"किधर गई DESHI STYLE ME कविता PADHE । Bachpan ki best kavita
"बचपन की बैलगाड़ी" Bachpan ki best kavita
अरे राजू!
अपना बचपन का बैलगाड़ी किधर गया?
जिसमें बैठकर दादा के संग
हम मेले देखने जाते थे —
काठ की पटरियों पर धीरे-धीरे हिलती,
मिट्टी की सोंधी खुशबू उड़ाती।
वो गाड़ी,
जिसके नीचे बंधी होती थी
पीतल की घंटी — टन-टन करती,
और बैलों की आँखों में
मानो एक कहानी होती थी।
वो पेड़ों की छांव,
वो खड़खड़ाती गाड़ी की धुन,
दादा की गोद में सर रखकर
ताकते थे हम आसमान —
जहाँ चांद भी लगता था
हमारी ही गाड़ी के पीछे-पीछे चल रहा हो।
अब तो बस ट्रैक्टर की आवाज़ें हैं,
मेलों में सेल्फ़ी और स्पीकर हैं,
पर वो दादा की मुस्कान,
और गाड़ी के पहिए की चरमराहट —
कहाँ चले गए, राजू?
चल, एक दिन फिर ढूंढें वो रास्ता,
जहाँ बचपन दौड़ रहा था
दो बैलों के बीच...
और हम
दुनिया की सबसे बड़ी सवारी में थे।
नोट:अगर पसंद आए तो comment लिखें और दोस्तों को शेयर करें
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें