Bachpan Ki Kavita | बचपन की यादें और गाँव की रोशनी पर कविता
बचपन की कविता – गाँव की रोशनी, सूर्या बल्ब और पहली बिजली की यादें। Bachpan ki kavita in Hindi with nostalgic village memories & childhood poetry.
सूर्या बल्ब की रौशनी
अरे राजू,
अपना सूर्या बल्ब किधर गया,
वो जो पहली बार हमारे गांव में
अंधेरे को हराकर चमका था?
याद है तुझे —
जब बिजली आई थी,
तो जैसे आसमान से कोई चमत्कार उतर आया था।
सारे मोहल्ले में सिर्फ एक बल्ब,
पर लग रहा था जैसे पूरा शहर जगमगाया था।
दादी ने उस दिन पहली बार घूंघट हटाकर मुस्कुराया था,
और काका ने दीवार पे छाया देखकर
पहली बार अपना चेहरा पहचाना था।
वो सूर्या बल्ब नहीं था,
हमारे सपनों की पहली चिंगारी था,
जिसने अंधेरे से लड़ना सिखाया,
और उम्मीद को नाम दिया — "रोशनी"।
अरे राजू,
अब तो LED आ गई,
स्मार्ट लाइट्स भी हैं...
पर वो पीली-सी, झिलमिल-सी रोशनी
दिल में आज भी जलती है।
अगर मिल जाए कहीं वो पुराना बल्ब,
तो उसे फिर से छत पर टाँग देना,
ताकि बचपन की शामें
फिर से उजली हो जाएं।
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