बचपन की "ब्लैक एंड वाइट यादें" टीवी वाली कविता पढ़ने के बाद । Bachpan ki best kavita
" ब्लैक एंड वाइट वाले दिन"
Bachpan ki best kavita
अरे राजू,
अपना ब्लैक एंड वाइट टीवी किधर गया?
जिसमें बचपन की आंखों ने
पहली बार रंगों के बिना भी
खुशियों की दुनिया देखी थी।
जिस पर रामायण आते ही
पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो जाता था,
घर का आंगन सिनेमाघर बन जाता,
और चाय की प्याली में
दुनिया की मिठास घुल जाती।
वो एंटीना को छत पर घुमाना,
"हाँ अब साफ दिख रहा!" —
नीचे से चिल्लाना,
और फिर से ऊपर दौड़ना।
वो टीवी पर बर्फ़ जैसी झिलमिलाहट,
जिसे हम 'डिश खराब' समझते थे,
पर आज समझ आया
वो तो हमारी मासूमियत की तस्वीर थी।
अब तो सबकुछ HD हो गया है,
रंग भी, आवाज़ भी,
पर वो एहसास, वो ठहराव
किसी स्क्रीन पर नहीं आता।
अरे राजू,
कहीं तूने भी तो
उस ब्लैक एंड वाइट टीवी के साथ
अपना बचपन तो नहीं रख दिया?
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