फौजी चाचा किधर नज़र नहीं आ रहे हैं? कविता SHAYRI । Bachpan ki best kavita
फौजी चाचा किधर नज़र नहीं आ रहे हैं?
अरे राजू, अपने फौजी चाचा किधर नज़र नहीं आ रहे हैं?
जो हर छुट्टी में यूनिफॉर्म पहन कर छत पे झंडा लगाते थे,
और गांव भर के बच्चों को देशभक्ति सिखाते थे।
जिनकी चाल में परेड थी,
और आंखों में मातृभूमि का गर्व,
जो "जय हिन्द" बोलते तो लगता जैसे हवा भी सलामी देती है।
वो हर बार घर आते तो मां कहती –
"बहुत दुबले हो गए हो बेटा,"
और वो मुस्कुरा के कहते –
"सीमा पे रोटी नहीं, फर्ज़ पहले आता है माँ।"
राजू, तूने उन्हें देखा क्या,
वो जो बच्चों को कंधे पे बिठा के तिरंगा घुमाते थे,
जो गोली की आवाज़ सुनकर भी हिम्मत से मुस्कुराते थे।
अबकी बार त्यौहार में नहीं आए,
ना राखी पर, ना दिवाली पर,
ना ही मंदिर की चौखट पे देखा उन्हें झुकते हुए।
कहीं फिर से सीमा पे तो नहीं चले गए?
या किसी पोस्टिंग में चुपचाप ड्यूटी बजा रहे हैं?
राजू, जब भी बात हो उनसे,
तो कह देना – गांव अब भी उनका इंतज़ार करता है,
और हर बच्चा आज भी उन्हें "हीरो चाचा" कहता है।
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