दादा जी वाला धपली झाल _कविता PADHE MAJEDAAR DESHI STYLE ME
🥁 कविता: दादा जी वाला धपली झाल
राकेश प्रजापति
अरे राजू,
अपने दादा जी का नाचने वाला झाल किधर गया?
वो जो बजता था
तो लगता था जैसे पूरी मिट्टी थिरक उठी हो।
मेला हो, देवी जागरण हो,
या फिर कोई शादी-ब्याह का फेरा —
दादा जी की झाल की आवाज
हर ताल को जीवन देती थी।
हाथ में कांपती उंगलियाँ,
पर धुन में कोई कमी नहीं,
जब वो बजाते थे,
तो भीड़ में भी भगवान उतर आता था कहीं।
झाल के हर झंकार में
गांव की धड़कन होती थी,
वो सिर्फ वाद्य नहीं,
बल्कि दादा जी की आस्था का औज़ार था।
अब ना वो झाल है,
ना दादा की वो तान,
बस बची है कुछ सांसों में गूंजती थाप,
और एक कोने में
धूल से ढका एक खाली थाल।
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