पढ़ें मिट्टी के घड़े का जीवन देने वाले कुम्हार की कविता "कुम्भार की मिट्टी"
मैं कुम्हार की मिट्टी हूं…
तू हवा है… इश्क़ वाली,
ना दिखती है, ना रुकती है,
पर जब छूती है,
तो मैं… मिट्टी से मोहर बन जाता हूं।
मैं कुम्हार की मिट्टी हूं…
तेरे इश्क़ की छुअन से
रूप लेता हूं,
तेरे ग़ायब होते ही…
दरकने लगता हूं।
छत की मुंडेरों पर तेरा नाम लिख आता हूं रोज़,
और फेसबुक की रीलों में…
तेरी मुस्कान की तलाश करता हूं।
तेरे हर ‘व्यू’ में
मेरी धड़कन बसती है,
तेरे हर 'स्क्रॉल' में
मेरा इश्क़ मिटता है।
अब जो घड़ा बना हूं,
उसमें पानी से ज़्यादा…
तेरी यादें भरी हैं।"**
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