Bachpan-Ki-Kavita जुगनू सिर्फ किताबों में बचे हैं
जुगनू गायब हैं
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यह कविता उस दौर की याद दिलाती है जब जुगनू, चांद और तारे हमारी रातों के साथी थे। अब मोबाइल की रोशनी ने वो जादू छीन लिया है। पढ़िए एक दिल छू लेने वाली कविता जो पुरानी यादों और नए युग की सच्चाई को जोड़ती है।
✨वो रातें जब जुगनुओं से बातें होती थीं✨
वो रातें जब जुगनुओं से बातें होती थीं,
अब मोबाइल की टॉर्च से नींदें कटती हैं।
पहले शेरों में होते थे चांद, जुगनू, तारे,
अब हर मिसरे में मोबाइल और नेटवर्क के इशारे।
जुगनुओं का ज़िक्र अब किताबों तक सीमित है,
अंधेरे में अब बच्चे मोबाइल की टॉर्च से खेलते हैं।
वो जुगनू पकड़ने की तड़प अब बच्चों में कहाँ,
अब टॉर्च ऑन करके स्क्रीन से दिल लगाते हैं वो जहाँ।
पहले रातें ठंडी हवा में कहानियाँ कहती थीं,
अब नाइट मोड में चैट्स की रोशनियाँ रहती हैं।
वो आँगन में बैठकर तारे गिने जाते थे,
अब वाई-फाई सिग्नल गिनने में दिन कट जाते हैं।
कभी धुंधली लौ में सपने सजाए जाते थे,
अब रील्स में सपनों के फिल्टर लगाए जाते हैं।
कभी माँ की लोरी से नींद आती थी प्यारी,
अब नोटिफिकेशन की टन-टन से जग जाती है दुनिया सारी।
कभी चाँद को देखकर मन मांगे वर मांगा जाता था,
अब “ऑनलाइन” देखकर रिप्लाई का डर सताता है।
पहले जुगनुओं से उम्मीदें जगमगाती थीं,
अब स्क्रीन की लाइट से आँखें थक जाती हैं।
कभी सन्नाटे में भी सुकून बसता था,
अब शांति भी नेटवर्क की स्पीड पर टलता है।
वो खामोशियाँ अब स्टेटस में बदल गई हैं,
हर एहसास पर अब “टाइपिंग…” लिखी दिखती हैं।
वो चाँदनी रातें अब ब्लू लाइट में खो गईं,
रोशनी बढ़ी जरूर, पर आँखें सो गईं।
पहले दिल की बातें हवा कह जाती थी,
अब “सेन्ड” दबाने में भी हिचक रह जाती है।
जुगनुओं की वो मासूम चमक याद आती है,
जब खुशी बिना कैमरा ऑन किए भी आ जाती है।
कभी पेड़ों के पीछे से रोशनी झिलमिलाती थी,
अब चार्जिंग के बिना दुनिया रुक जाती है।
वो रातें लौट आएँ, तो कितना अच्छा हो,
जहाँ टॉर्च नहीं, फिर जुगनुओं का घर अच्छा हो।
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